गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

तेँ किछु आर (समीक्षा) 

                                                                           -- उदयचंद्र झा 'विनोद'
विपुल उनका ऋण , सधा सकता न मैं दशमांश, जनकवि नागार्जुनक ई पाँती आइ बडी जोर सँ मोन पडि आयल जाहि काल नवाररम्भ सँ सदयःप्रकाशित कविताक 128पृष्ठीय एक गोट किताब पढैत रही, कवि छथि मैथिली आ हिन्दी मे समान गति सँ कविता लिखैत सहरसा जिलाक चैनपुर गामक निवासी आब प्रवासी चौंतीस वर्षीय युवा अरुणाभ सौरभ आ पोथीक नाम थिक तेँ किछु आर। एहि किताब मे यत्र तत्र सर्वत्र से ऋण सधयबाक उपक्रम करैत हिनका सुविधापूर्वक देखल जा सकैत अछि। एतबे टा नहि, एहि नामक हिनक पहिल संग्रह पढल अछि, हिन्दीक दीर्घ कविता प्रसंग लम्बी कविता का वितान नामक एक सुन्दर विवेचनात्मक किताब हालहि मे पढि तृप्त भेल छी।मैथिली मे साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार आ हिन्दी मे भारतीय ग्यानपीठ युवा सम्मान सँ स्वीकृत एहि प्रतिभाक वितान हमरा सतत आनन्दित करैत रहल अछि। निस्संदेह नागार्जुन आ राजकमल चौधरीक बाद अरुणाभक माध्यमे हिन्दी कविता मे कोनो मैथिलक ई प्रबल हस्तक्षेप थिक।
हिनका कविता मे एक आम भारतीय नागरिक रूप मे एक मैथिल अपन उज्ज्वल अतीतक परिप्रेक्ष्य मे सीदित वर्त्तमान बजैत अछि। एकरंगा दुनिया बनयबाक सूरसार विरूद्ध हिनक कविता धारदार हथियार जकाँ अडैत अछि। हिनका स्मृतिक पेटार मे आलिंगनक चंगेरा मे चुम्बनक अहिवात पुरहर संग बिताओल सुखक अंतरंगता सैंतल अछि।हिनका अपना गामक संग मोन पडैत छनि
फूल बाबूक, भारती मंडनक गाम महिषी। बनगाम मोन छनि। मायानन्द मिश्रक जेना ई चर्च करैत छथि, कोशी मे विलुप्त होइत माया बाबूक बनैनियाँ संग अनेक गामक जेना ई उदाहरण दैत छथि, अपराध गाथा मे ओझरायल सहरसाक जेना खोज करैत छथि से ठीके विशेष। स्वतः प्रमाणम हिनका मोन छनि , कटगर खटगर स्नेहिल मातृभाषा हिनका अपना दिस घीचैत छनि। विविधताक पक्ष मे सामर्थ्य सँ लडैत कवि के विश्वास छैक जे अन्ततः लोकल जितबे करतै, चाउर देखबाक लिलसा लागल नहि रहतै। बँसबिट्टीक कोइलीक स्वर एखनो अकानैत छथि, छोट छीन दोकान दौरीक महत्व मानै छथि, फँसरी लगा नहि मरतै आब गरिबहा से तानैत छथि। केहन दिब कहैत छथि से कनिएँ देखल जायः
हम कहब माटि ओ कहताह इस्पात
हम कहब खेत ओ कहता लैब
हम कहब खेती ओ कहता डिजिटल
हम कहब गाछ ओ कहता मौल
हम कहब पानि अओ कहता वाइन
हम कहब भूख ओ कहता विकास
हम कहब रोटी ओ कहता पिज्जा।
नियोजित विचार सँ पूर अपन एहि विलक्षण सर्जकक हम स्वागत करैत छी संगहि आशा करैत छी जे निरन्तर नव क्षितिजक संधान करैत आगाँ बढताह, भाषा भूमिक विरूद्ध चलैत दुरभिसन्धिक उकन्नन करताह। जय मैथिली।

वाक्य


                  
                      वाक्य आ वाक्य भेद 
                                                                                     - डॉ. अरुणाभ सौरभ


परिभाषा:  सार्थक शब्दक एहन समूह, जेकर आशय पूर्णत:  स्पष्ट होइ, वाक्य कहल जाइत अछि |
वाक्य-भेद
वाक्यक वर्गीकरण दुइ  प्रकार सँ  कएल जा सकैत अछि-
1 अर्थक दृष्टि सँ
2 रचनाक दृष्टि सँ |
अर्थक दृष्टि सँ वाक्यक आठ भेद कएल जा सकैछ-
1 विधानवाचक वाक्य
2 निषेधवाचक वाक्य
3 आज्ञावाचक वाक्य
4 प्रश्नवाचक वाक्य
5 विस्मयवाचक वाक्य
6 संदेहवाचक वाक्य
7 इच्छावाचक वाक्य
8 संकेतवाचक वाक्य

1 विधानवाचक वाक्य - विधानवाचक वाक्य मे क्रियाक हेबाक अथवा ओकर प्रक्रियाक बोध होइत अछि |
उदाहरण- ओ घर जेतीह |
हम कहने रही जे ओ घर जरूरे जेतीह |
अजित जी मधुबनी जेताह ।

2 निषेधवाचक वाक्य  जाहि वाक्यमे कार्य नहि हेबाक भाव प्रकट होइत अछि, निषेधवाचक वाक्य कहल जाइत अछि |
उदाहरण-
हम भोजन नहि केलहुँ |
हाँ गाम नहि जा रहल छी|
3 आज्ञावाचक वाक्य – ओ वाक्य जकरा द्वारा कोनो प्रकारक आज्ञा देल जाइत हो, आज्ञावाचक वाक्य कहल जाइत अछि |
उदाहरण : सभ गोटे शांत भऽ जाउ |
         हाँ लोकनि बैस जाउ ।

4 प्रश्नवाचक वाक्य: ओ वाक्य जाहि मे प्रश्न कएल जाइत अछि, प्रश्नवाचक वाक्य
कहल जाइत अछि |
उदाहरण : अहाँ कोन पोथी पढि रहल छी?
         राजकमल चौधरी बेसी रुचैत अछि कि धूमकेतु?
         हाँक प्रिय कवि के छथि ?
5 विस्मयवाचक वाक्य: ओ वाक्य जाहि मे कोनो प्रकारक गहन अनुभूतिक प्रदर्शन कएल जाइत अछि, विस्मयादिवाचक वाक्य कहल जाइत अछि | हर्ष, शोक, विस्मय, आश्चर्य आदिक लेल एहि प्रकारक चिह्नक प्रयोग कएल जाइछ- (!)
उदाहरण : वाह ! कोसीक पानि साफ चकचक अछि |
         ओह ! कतेक ठंडा पानि अछि |
         बाप रे बाप एतेक बड्का सांप !
         आहिरे जीवकांत जी नहि रहलाह !
6 संदेहवाचक वाक्य: ओ वाक्य जाहि मे कोनो कार्य केर संदेहक बोध कराओल जाइत अछि, संदेहवाचक
 वाक्य कहल जाइत अछि | एहि मे संशय,संदेह आदिक स्थिति बनल रहैत अछि ।
उदाहरण : महेंद्र बाबू अओताह कि नहि ।
        चुन्नू जी काज केने हेताह कि नहि ?
        काल्हि साइत अशोक जी बोरिंग रोड चौराहा पर छलाह |
7 इच्छावाचक वाक्य: ओ वाक्य जाहि मे कोनो इच्छा, आकांक्षा या आशीर्वाद केर बोध कराओल जाइत अछि, इच्छावाचक वाक्य कहल जाइत अछि |
उदाहरण : नववर्ष मंगलमय होइ |
अपनेक दिन शुभ हुअए |
8 संकेतवाचक वाक्य: ओ वाक्य जाहि मे एक क्रियाक दोसर क्रिया पर निर्भर होयबाक बोध/संकेत होइ संकेतवाचक वाक्य कहल जाइत अछि | एहि वाक्य मे संकेतक बोध होयत अछि तेँ संकेतवाचक वाक्य
कहल गेल अछि |
उदाहरण : गोविंद बाबूक डेरा ओमहर छनि |
         एमहर आउ |
         रमानंद झा रमण जी ओमहर रहैत छथि ।
 अर्थक आधार पर वाक्य-परिवर्तन
वाक्यक अर्थ मे बिना कोनो तरहक परिवर्तन केने एक प्रकार सँ दोसर प्रकारक वाक्यमे परिवर्तित करनाय वाक्य-परिवर्तन कहल जाएत अछि।

विधानवाचक वाक्यक परिवर्तन
कुमार गगन नाटक खेलाय छ्थि ।
 १ - विधानवाचक वाक्य - कुमार गगन नाटक खेलाय छथि
२ - आज्ञावाचक वाक्य - कुमार गगन! नाटक खेलाओ ।
३ - निषेधवाचक वाक्य - कुमार गगन नाटक नहि खेलाय छथि ।
४ - प्रश्नवाचक वाक्य -  की कुमार गगन नाटक खेलाय छथि ?
५ - विस्मयादिवाचक वाक्य - वाह! कुमार गगन नाटक खेलाय छथि ।
६ - इच्छावाचक वाक्य – ओह कुमार गगन नाटक खेलैबतैथ !
७ -संदेहवाचक वाक्य - कुमार गगन नाटक खेलायत हेताह ।
८ - संकेतवाचक वाक्य – जौं कुमार गगन नाटक खेलाबथि तऽ दर्शकक कोनो कमी नहि रहत ।


रचनाक आधार पर/ रूपक आधार पर वाक्य भेद
रचनाक आधार पर वाक्यक तीन भेद कएल गेल अछि-
1.      सरल वाक्य
2.      संयुक्त वाक्य
3.      मिश्र वाक्य
सरल वाक्य- जाहि वाक्य मे एक पूर्ण क्रिया आ कर्त्ता रहए ताहि वाक्य केँ सरल वाक्य कहल जाइत अछि । यथा- गुफरान पोथी लिखि रहल छथि ।
       गोपाल गेलाह ।
        रामकुमार जी भोजन कऽ रहल छथि ।
संयुक्त वाक्य-  जाहि वाक्य मे दू वा दू सँ अधिक खण्डवाक्य रहए ताहि वाक्य केँ संयुक्त वाक्य कहल जाइत अछि । एहि वाक्यक प्रत्येक खण्ड वाक्य स्वतंत्र रहैछ । एहि वाक्यमे आ, , आओर, तथा, मुदा इत्यादि समानाधिकरण अव्यय अबैछ । अर्थात जाहि वाक्य मे सामान दरजाक अनेक उपवाक्य संयोजक सँ जोडल रहए ।
 यथा-  मुख्तार आलम कवि छथि मुदा ओ अध्यापक छथि ।
अभय बड्ड प्रतिभाशाली छथि मुदा घरक गरीब ।
एहि दुओ वाक्य मे दू स्वतंत्र खण्डवाक्य मुदासंयोजक द्वारा संयुक्त कएल गेल अछि ।
मिश्र वाक्य-  जाहि वाक्य मे दू वा दू सँ अधिक खण्डवाक्य रहए मुदा मुख्य खण्डवाक्य आ अन्य सहायक खण्डवाक्य हो ताहि वाक्य केँ मिश्र वाक्य कहल जाइत अछि । एहि वाक्य मे सहायक खण्डवाक्य संज्ञा, विशेषण आ क्रिया विशेषण खण्डवाक्य रहैछ । जे, जेना, तेना, जहिया, जतए, यदि, अथवा, जहन,जौं , यथा, तथा, अत: , अतएव इत्यादि संयोजक खण्डवाक्य केँ मिलबैछ ।
जौं वर्षा नहि भेल तऽ अकाल पडत ।
गुंजन श्री देखलनि जे मारिते रास दहीक छांछी राखल अछि ।
संयुक्त वाक्यमे दुओ उपवाक्य समकक्ष रहैत अछि, मिश्रवाक्य मे एक उपवाक्य प्रधान (मुख्य उपवाक्य) रहैत अछि आ दोसर अप्रधान ( आश्रित उपवाक्य) रहैत अछि ।
अरविंद अक्कू जे नाटककार छथि फुटानी चौक शीर्षक सँ नव नाटक लिखलनि !


सोमवार, 13 अप्रैल 2020


                              मैथिली आलोचनाक वर्त्तमान

                                                                                                                                                      - डॉ. अरुणाभ सौरभ

                  मनुख जखने अपन नेनपन सँ विभिन्न चेष्‍टादि करैत अछि तखने सँ भाषा ओ बूझैत अछि। नेनाक कननाय हँसनाय विभिन्न संकेत सभ, चेष्‍टा आ क्रिया अछि सबकिछु भाषाक अंतर्गत होयत अछि। भाषा अपन सभ रूप सँ एकटा नेना केँ क्रियशील बनबैत अछि। तार्किकता आ तर्कणा शक्ति जखने मनुखक बढ़ैत अछि भाषा गहींर हुअए लगैत अछि। गहींर भाषा मे तार्किकताक संग सृजनात्मक गप्प जखने ओ नेना आरंभ करैत अछि ओ आलोचक भऽ जायत अछि। आलोचना शक्ति मनुखक जीवन क्रम केर स्वाभाविक विकास छी। आलोचना पाठ धरि सीमित विधा किन्नहु नहि थिक। आलोचना समुच्चा जीवनक अध्ययन सहो नहि थिक। साहित्य मे जखन आलोचना पर गप्‍प हुअए तऽ स्पष्ट रहबाक चाही जे आलोचना स्वतंत्र विधा छी। आलोचना रचनात्मक विधा थिक। कोनो पाठ के प्रति एकटा जवाबदेह पाठकक प्रतिक्रिया थिक-आलोचना। जवाबदेही सँ भरल प्रतिक्रिया जकरामे स्थापना आ समाधान दुओ होयत अछि। रचनाक विभिन्न कोण सँ आलोचनाक विकास हेतै सेहो आवश्यक नहि! आलोचना एकटा विवेकवान प्रक्रियाक परिणति होयत अछि, जकरा मे आधार आ अधिरचना दुओ लेल आवश्यक आ अनिवार्य जग्‍गह होयत अछि। एकटा विवेकवाण प्रक्रियाक सामाजिक स्वीकृति आलोचना केँ संबल दैत अछि। ध्यान रहबाक चाही जे आलोचना शास्त्रीय प्रक्रिया थिकै। आलोचना सँ रचनाक मूल्यांकन मात्र नहि होयत अछि, अपितु ज्ञानक मुख्य अनुशासन सँ साहित्य केँ जोड़बा मे (रचना केँ) आलोचना सेतु जकाँ काज करैत अछि।

               मिथिला समाज मे आलोचनाक लेल उर्वर भूमि रहल अछि। मिथिला प्रयोगक लीला भूमि छी। सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक प्रयोग साहित्य, कला आ रंगमंच आदि लेल मिथिला एकटा उर्वर प्रयोग भूमि शुरूहे सँ रहल अछि। मिथिलाक भाषा मैथिली आ ओकर साहित्य मे आलोचनाक स्थिति नेनाक प्रथम बोलि जकाँ रहल अछि। मैथिली साहित्य मे आलोचनाक स्थिति कमज़ोर रहल अछि से गप्‍प नहि। तखन ई गप्प स्वाभाविक अछि जे आलोचना लेल जे आधुनिक स्कूल वा थॉट चाही से एहिठाम नहि रहल। आ जौं रहल तऽ कोनो स्कूल एहिठाम आलोचनाक विधागत चिंतन केँ ओतेक गति नहि दऽ सकल! हम सभ मैथिल आँखि आ मैथिल टार्च सँ मैथिली साहित्यक मूल्यांकन करैत रहलहुँ जे साहित्य केँ मुक्त करबाक अपेक्षा बान्‍हलक बेसी। पाठ आ ओकर आलोचना लेल उन्‍मुक्‍तता चाही, स्‍वाधीनता चाही बन्‍हन नहि। 

                स्वतंत्र भारतक प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भारतीय इतिहास केँ बाहरी आलोचकक आँखि सँ देखबा पर बल दैत रहलाह। हमर मैथिली साहित्यक आलोचक लोकनि मैथिली साहित्य केँ ‘मैथिल आँखि' सँ देखबाक लेल दुराग्रह करैत रहलाह अछि। ई एकटा बालहठ जकाँ छल, तेँ हम बीसम-एकैसम शताब्दी मे बढ़ल मैथिली आलोचना केँ बाल्यकाल मे देखैत छी। बालहठ, जिद आ बालकोचित स्वाभाव मे निर्मित ‘मैथिल आँखि’ संकुचन दिस हमरा सभ केँ लऽ गेल अछि। ई ‘मैथिल आँखि’ वला टर्मनिलॉजी किरण जी जखन देलनि ओ समय किछु आर छल। आरंभिक समय मे बालहठ स्वीकृत-सम्‍मानित कएल जा सकैछ। मूल्य, समय आ समाज आब एकदमे विपरीत भऽ गेल अछि। एककात नेहरूक इतिहास केँ बाहरी आलोचक जकाँ देखबाक बेगरता आधुनिक भारतीय मानस गढ़बा मे सहायक भेलनि आ दोसर कात मैथिल आँखि सँ मैथिली साहित्य केँ देखबाक हठ प्रतिगामी सोच दिस धकेल देलक आ हम सभ आलोचना मे पछुआ गेलहुँ! मोहन भारद्वाज सन आलोचक जे अपन गंभीर स्थापना लेल जानल जायत छथि। अपन एकटा साक्षात्कार मे ‘‘मैथिली साहित्यक आलोचना मिथिला केँ पढ़ि कऽ कयल जयबाक चाही'' धरि सीमित करैत छथि। मिथिला केँ पढ़ब नीक गप्प मुदा मिथिला केँ मैथिले आँखि सँ पढ़ब बालहठ नहि तऽ आर की? मिथिला केँ बाहरी आलोचकक आँखि सँ पढला पर अतीतक प्रति दुराग्रह नहि रहत! ई ‘मैथिल आँखि' बला सिद्धांत भावुकता दिस उन्मुख अछि। एहन भावुकता जे- 'मिथिले मे रहबै’ टाईप दुराग्रह रखने होय! भावुकता, करुणा आ संवेदनशीलता पर्याप्त रहलाक बादो ‘मैथिल आँखि’ बला सोच मे तार्ककिता, वैज्ञानिकता, वस्तुनिष्ठता आदि अपर्याप्त अछि। आलोचनाक तेवर एहि सभ सँ कमजोर होयत अछि-तार्किकताक धार कुंद भऽ जाइछ, वस्तुनिष्ठता अपन प्राण तियागि दैत अछि आ वैज्ञानिकता अपन बाट बदलि एकठाह नाह पर सवार भऽ जायत अछि। तेँ जखन अपन धरती सँ अपन धरतीक मूल्यांकन हएत तऽ भावुकताक खतरा ओहिठाम स्वाभाविक रूपेँ रहत। हम स्पष्‍ट कऽ  दी मैथिली साहित्यक मूल्यांकन मिथिला कऽ पढ़ि कऽ हुअए मुदा मैथिल आँखि सँ नहि इतिहासक बाहरी आलोचकक दृष्टि सँ होयत तऽ बेसी नीक!

                          आलोचना सँ लोकतंत्र के मजगूती भेटैत अछि। लोकतांत्रिक विवेक आलोचना संस्कृति सँ विकसित होयत अछि आ आलोचनात्मक विवेक लोकतांत्रिक सँस्कृति सँ। एहि दुओ लेल असहमति बड्ड आवश्यक अछि। अपन समाज, कला, वैज्ञानिकता, अपन मूल्य, अपन ज्ञान-परंपरा सभ सँ आ अपन रचनात्मक सोच आ अपन स्वयं सँ सेहो असहमति विराट सोच लेल जरूरी छै। असहमति जखने नीक सँ हेतैक आलोचना ओतबे मजगूत हेतैक, जाहि लेल बाहरी आलोचक भाव सँ साहित्यक मूल्यांकन बेसी गंभीर हेतैक! आ ओहि सभ लेल मैथिल आँखि नहि, अंतरराष्ट्रीय सोच, अप्रोच चाही। तखने अपन साहित्य केँ वैश्विक पटल पर लऽ जेबा मे अपना सभ समर्थ होयब!

                     अपन साक्षात्कार मे मोहन भारद्वाज कहैत छथिन - ‘‘मैथिली आलोचनाक एकटा इतिहास छैक। ओना मैथिली मे अनुसंधान आ व्याख्याक काज करयबला पहिल रचनाकार छथि चन्दा झा। किन्तु ओ आजुक अर्थ मे आलोचक नहि छलाह। एहि दृष्टिकोण सेँ मैथिलीक पहिल आलोचक छथि रमानाथ झा। किन्तु, रमानाथ झाक आलोचनाक सीमा छनि। ओ अंग्रेजीक विद्यार्थी भइयो कऽ संस्कृत मानसिकताक लोक छलाह। साहित्यक प्रति हुनक अवधारणा संस्कृत काव्यशास्त्रक पृष्ठभूमि मे पल्लवित भेलनि। मैथिली साहित्यक ओ जे व्याख्या आ विश्लेषण कयलनि तकर कसौटी छल संस्कृत काव्यशास्त्र। हुनका बाद अथवा हुनका संग दू व्यक्ति आओर एहन छथि जे मैथिली साहित्यकेँ बुझबाक आँखि देलनि। ओ सभ छथि कांचीनाथ झा ‘किरण’ तथा रामकृष्ण झा ‘किसुन’। ........ सोझ शब्द मे कही जे मैथिली साहित्य केँ अर्थात् सर्जनात्मक साहित्य केँ मार्क्सवादी आधार देलनि यात्री आ मैथिली आलोचना केँ मार्क्सवादी आधार देनिहार छथि-कुलानन्द मिश्र।''1

                    मोहन भारद्वाज एहन स्थापना देबाक क्रम मे बहुत रास गप्‍प करै छथिन। मैथिली आलोचना मे रमानाथ झाक बाद जे नाम बड्ड गंभीरता सेँ किछुओ देखलनि से छथि-मोहन भारद्वाज! मोहन भारद्वाज लग सोझराएल आलोचना दृष्टि रहनि। अपन बात कहबा जोगर आ स्थापना-देबाक जोगार सेहो छलनि। तैयो जे गद्य कुलानन्द मिश्रक रहनि ओ गद्य आ गद्य मे कहबाक हुनर मोहन भारद्वाज वा कोनो आर मैथिली आलोचक लग नहि रहल! तटस्थताक अभाव कतहु नहि रहनि तैयो भारद्वाज जी समकालीन कविता मे एक्को डेग नहि बढेलाह! मोहन भारद्वाज प्राचीन डाक वचन पर जे गप्‍प कहलानि, वा बलचनमा पर, समकालीन कथा पर, पुरना सभटा बात केँ सम्‍हारलनि। 
                    आय विश्‍व साहित्‍य मे जखन ‘ट्रांस रियलिज्म’ आ 'पोस्ट ट्रुथ' केर गप्‍प कयल जा रहल अछि। जखन उत्तर मार्क्सवाद केर स्थापना सँ साहित्यक मूल्यांकन होइछ तखन ई स्वाभाविक जे खाली 'मैथिल आँखि' अपर्याप्त अछि। मिशेल फूको सवाल उठौने छलाह कि विज्ञान केँ हम समकालीन समय मे कोना देखब? एकरा स्पष्ट करैत ओ कहने छथि जे सैद्धांतिक भौतिकी एवं कार्बनिक रसायन, अर्थव्यवस्था एवं राजनीति सँ जाहि तरह संबद्ध अछि, की ओकर सहज व्‍याख्या संभव अछि? फूको लिखैत छथिन -‘‘हम कखनो नहि कहने छी जे ताकत केर अवधारणा सँ सभ वस्‍तुक व्याख्या कएल जा सकैत अछि। हमर प्रयास अर्थव्यवस्थाक भूमिकाक स्थान पर ताकतक भूमिक केँ स्थापित करबाक कखनो नहि रहल। हम ओहेन तमाम भिन्न विषयक बीच मे समन्वय स्थापित करबाक प्रयत्न कएल जे ताकत सँ संबद्ध रहल अछि। ......... हमरा लेल ताकत वएह अछि जकर व्याख्या कएल जा सकैत अछि।’’2
                 बद्लैत समय मे पाश्चात्य जगत केर 'फ्रैंकफर्ट स्कूल' दर्शन, आलोचना, साहित्य आ विचारधारा केँ नव आयाम देलक अछि हेबरमास (जर्मन दार्शनिक जुरेगेन हेबरमास) 1956 मे एडोर्नोक सहायक बनि फ्रैंकफर्ट स्कूल सँ जुड़ैत अछि। हेबरमासक लेल आधुनिकता एकटा दृष्टिमात्र नहि थिक अपितु समयक गतिशीलते आधुनिकता छी। हिनक बहुचर्चित लेख, छनि – 'Modernity an Unfinished Project' जाहि मे ओ एकठाम लिखैत छथि - ‘‘सभ काल मे एक नव विषय वस्तुक संग आधुनिकताक अभिव्यक्ति, एकटा एहन युग चेतना सँ स्वयं केँ अलग करैत अछि जाहि मे कोनो अतीतक शास्त्रीय चेतना होइत अछि।’’3

                   राजकमल चौधरी एकटा बड्ड नीक टिप्पणी कविताक अर्थ खोज प्रक्रिया पर केने छथिन - ......... ‘‘कविता मे अर्थ ताकब, दूधक बाटी मे राखल अनन्त भगवान केँ ताकब नहि थिक, जे आंगुर राखि, इच्छा करिते अर्थ भेटि जायत। रस प्राप्त करबाक लेल पहिने रससिद्ध होयब आवश्यक आ अर्थ प्राप्त करबाक लेल अर्थ-शिक्षित।'' 4 आलोचनाक संदर्भ मे प्रासंगिक अछि ई गप्‍प। राजकमल जी आलोचनाक संधान कहियो नहि कएलाह। ओ आलोचनाक बनल-रटल-रटाएल परिपाटी सँ भिन्न एकटा निर्भ्रांत रचनाकार रहलाह बेछप आधुनिकतम मानुष!

                     हमरा जनैत मैथिलीक आलोचना परंपरा मे असहमतिक परंपरा कुलानन्द मिश्र गढ़ैत अछि। कुलानन्द जी मैथिलीक कविता परंपरा में बदलैत सौंदर्य बोध खोजऽ वला एकसर आ सार्थक आलोचक छथि। सौंदर्य बोधक स्वरूप कोना बदलतै आ कविताक विवेचनक कोन आधार हेतै तकर विश्लेषण मे कुलानन्द जी ‘‘बदलैत सौंदर्य बोध आ कविता’’ शीर्षक सँ प्रकाशित एकटा महत्‍तवपूर्ण पोथी मे केने छथि। ध्यान रहए जे कुला बाबूक विश्लेषण आ चिंतनक धार मार्क्सवादी रहल। मार्क्सवादी सौंदर्यबोध, कलाक प्रति वैज्ञानिक समाजवादी अप्रोच सँ विश्लेषण करबाक अद्भुत क्षमता हिनके मे रहलनि। एहि परंपराक डारि कुलानन्द मिश्रक बाद सुखा गेल। समाजवादी संकल्पनाक गप्‍प करैत लिखैत छथिन -
‘‘समाजवादी संकल्पना व्यक्ति आ समाजवादी समाजिकताक वास्तविकताक बीच सामंजस्यक विचार केँ सर्वोपरि महत्‍व दैत अछि। एकर ई अर्थ नहि जे मनुष्य आ विश्‍वक अध्ययन मे समाजवादी कला आ साहित्य अस्तित्वक कठिनता तथा परिस्थितिजन्य अनिवार्य विरोधक बात पर ध्यान नहि रखैत अछि, तथापि ओहि साहित्य आ कला मे मुख्य बात ई देखबा मे आओत जे ओहि मे जीवनक विषमता आ विरोध पर बिनु कोनो आवरण देने ओ व्यक्ति संकल्पनाक निरूपण एहि प्रकारे करैत अछि जाहि सँ व्यक्तिक विश्वक संग, जे विश्व, आब मनुष्यक शत्रु नहि रहि गेल अछि जोड़ वला सूत्र सम अधिक स्पष्ट हो।’’ 5

     कुलानन्द मिश्र लग एकटा साम्यवादी दृष्टि रहनि ताहि अनुरूप हुनकर आलोचनाक प्रतिमान स्पष्ट छल। तेँ ओ मैथिली आलोचना मे एकटा प्रतिमान ठाढ़ करबा मे सक्षम भेलाह। मोहन भारद्वाज मैथिलीक खाँटी आलोचक छलाह। आलोचना केँ ओ संपूर्ण जीवन दऽ देने छथि। ओ आन विधा मे हाथ-पएर नहि भाँजैत छलाह। एकर अर्थ ई किन्नहु नहि भेल जे आन-आन आलोचक बहुविधावादी छथि हुनकर आलोचना कतहु सँ कमजोर भेल हो। डॉ. रामदेव झा, डॉ. भीमनाथ झा सन विशिष्टि प्राध्यापक सेहो मैथिली केँ भेटबाक गौरव भेल अछि। ईहो दुओ गोटए बहुविधावादी छलाह। तैयो आलोचना पर जखन गप्‍प करबै आ ओकर बहु वस्तुनिष्ठता पर गप्‍प करबै तखन बेसी काज तथ्यक संकलन धरि सीमित रहल भेटत। तकर अतिरिक्‍त प्राध्यापकीय ज्ञानक दबाब आ मजबूरी सेहो देखल जा सकैत अछि। एकटा जरूरी नाम अबैत छथि - डॉ. रमानन्द झा रमण। रमण जी सेहो आलोचना केँ एकमात्र संपूर्ण ऊर्जा दैत छथिन। आलोचना छोड़ि आन विधा मे ओहो नहि गेलाह। मुदा दृष्टिक जे गंभीरता आलोचना केँ चाही, से हुनको लग अभाव छनि। तेँ नीक सँ नीक विषय वस्तु आलोचनात्मक विवेकक अभाव रमण जीक काज केँ झूस करैत छनि। ओ काज अखियासल, बेसाहल, बेराएल, काज होइतो कोनो नीक विमर्श ठाढ़ करबा मे असमर्थ भऽ जाइत छनि। ओना तथ्यात्मकता रमण जी केँ सेहो विशिष्ट बनबैत छनि। आलोचना मे ध्यान रहए जे तथ्य संकलनक विशिष्टता केँ इग्नोर नहि कएल जा सकैत अछि। तथ्ये नहि, तथ्यात्मकते नहि तखन आलोचना कथिक आ कथि पर?

     रमानाथ झा मैथिली आलोचनाक भीष्म पितामह छथि। सरसय्या सँ हुनका मुक्ति हेनिहार केओ योद्धा जे अर्जुन रहितथि तऽ पितामह सभ दिनुका महाभारत देख लितथि।‘‘आचार्य रमानाथ झा सँ पूर्व मैथिली आलोचनाक रूपरेखा निर्विवाद रूपेँ संकुचित ओ अपुष्ट छल। कवीश्‍वर चन्दाझा सँ एकर विकास मानबा मे कोनो आपत्ति नहि, कारण मैथिली साहित्य मे आधुनिकता ओएह अनलन्हि।’’6

                 मैथिली आलोचना मे आलोचक लोकनिक खगता तेहन कहियो नहि रहलन्हि। बेसी लोक गवेषक; विश्लेषक आ अनुसंधानकर्ता छथि आ बेसी काज तथ्यक संकलन पर भेल अछि। मोहन भारद्वाज जौं खाँटी आलोचक छथि तऽ एहि भाषा मे पं. गोविन्द झा, डॉ. रामावतार यादव सन भाषा-वैज्ञानिक सेहो छथि प्रो. उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ सन अंतरराष्ट्रीय भाषा वैज्ञानिक एहि भाषा केँ भेटबाक सौभाग्य भेटल। नचिकेता जी कविता, नाटक, आलोचना (संपादकीय) खूब लिखलनि मुदा भाषा-विज्ञान पर एकटा पोथी मैथिली केँ देने रहितथि तऽ हमरा सभ लेल बहुत नीक रहितैक।

                अशोक, तारानन्द वियोगी, रमेश, विभूति आनंद, श्रीधरम सन् आलोचक मैथिली मे छैक तैयो ई लोकनि मूलतः आलोचक नहि, बहुविधावादी रचनाकार छथि। कमलानंद झा 'विभूति' मूलतः हिन्दीक विद्वान आलोचक आ शिक्षाशास्त्री छथि। आलोचनाक अपन तेवर संग मैथिली आलोचना केँ समृद्ध करबा मे लागल छथि। विभूति जी लग समधानल आलोचना दृष्टि छनि, मार्क्सवादी आलोचनाक स्थापत्य छनि । पत्र-पत्रिका मे मैथिली आलोचना करैत छथि, स्वतंत्र पोथी नहि छनि! मुदा मैथिली उपन्‍यास पर जे द़ष्टि विभूति जी लग छथि से अनयत्र दुर्लभ!
               डॉ. तारानंद वियोगी आ अशोक मैथिली आलोचना केँ नव-नव विमर्श दिस झीकबाक प्रयास केलनि अछि। तारानन्द वियोगी अपन दुओ पोथी ‘कर्मधारय आ 'बहुवचन' मे तकर प्रमाण देलनि। अशोक जी लग वएह ‘मैथिल आँखि’ केर समस्या छनि, जाहि मैथिल आँखि केर पावर बड्ड कमज़ोर अछि। ओना ‘वात विचार’ पोथी होय वा मैथिलीक आरंभिक उपन्यास पर देल गेल वक्तव्य होय वा 'मैथिल आँखि' ई सभटा अशोक जीक नीक काज छनि। मुदा नीक काज सँ विमर्श ठाढ़ करबाक क्षमताक भरण-पोषण नहि भऽ सकैछ। ‘मैथिल आँखि’ सँ मिथिला मे पसरल लोक-साहित्य हो अथवा मैथिलीक समग्र साहित्य तकर मूल्यांकन मे बाधा आएब स्वाभाविक! मिथिला समाज, तर्क, न्याय वैशेषिक वला समाज रहल अछि। दर्शन, ज्ञान-मीमांसाक समृद्ध परंपरा एहिठाम पुष्पित - पल्लवित भेल अछि। आधुनिक मिथिला समाजक लोक अपन आदिम परंपरा सँ व्यंग्य लेलनि, कटाक्ष लेलनि। तर्कवादी आ नीतिवादी हएब ई समाज बिसरि गेल। आलोचना आधुनिकताक उपज छी, आधुनिक समाज बनेबा मे आलोचनाक हस्तक्षेप आवश्‍यक अछि।

              जाहि समाज मे आलोचनाक संस्कृति कमजोर भेल अछि, तकर विखंडन भऽ गेल अछि। जकर बहुत नीक उदाहरण अछि - सोवियत यूनियन। सोवियत यूनियन अन्यान्य बहुतो कारण सँ विखंडित भेल, मुदा ओहिठाम आलोचनाक संस्कृति कमजोर भेल जाहि सँ एकटा पैघ समाजवादी स्‍वप्‍न पूर्णतया भंग भेल तेँ आलोचनाक संस्कृति आ असहमतिक स्वागत समाज मे हेबाक चाही। जौं समाज मे आलोचक नहि रहतै तऽ ओकरा मे आंतरिक लोकतंत्र कोना बहाल हएत! मिथिला समाज केँ अपन जड़ि मे जेबाक निश्चिते जरूरत अछि, मुदा जड़ि मे जा कऽ जडिया कऽ, जड़दगब हेबाक किन्नहु जरूरति नहि अछि।
तखन ई गप्‍प बड्ड अबूह लगैत अद्दि जे मिथिला समाज आलोचना प्रेमी समाज रहल अछि ओकर आलोचना दृष्टि एतेक कमजोर किएक? अशोक अविचल, रवीन्द्र कुमार चौधरी, देवेन्द्र झा, इन्दुधर झा सन किछु अध्यापक लोकनि सेहो अपन अध्यापकीय आलोचनाक विकास मे नीक सँ जुटल छथि। हिनका लोकनि मे भीमनाथ झा आ रामदेव झा सन आलोचकीय दृष्टिक अभाव छथि! भीम बाबूक बहुधा अधीत दृष्टि आ संरचनावादी मूल्य मैथिली आलोचना केँ नव अध्याय सँ जोड़ैत अछि। रामदेव बाबू लग विराट गवेशणात्मक दृष्टि, शोधपरक अवधारणा आ समीक्षात्मक मूल्य छनि। ओ जतेक पोथी संकलित केलनि ओकर भूमिका मे  मारिते रास स्थापना देलनि।

              साहित्यक इतिहास लिखबाक जतेक चेष्‍टा मैथिली में भेल अछि ओ सभ लेखन आलोचना विधा सँ बेसी मजगूती सँ सोझाँ आयल अछि। मैथिली साहित्यक इतिहास जयकांत मिश्र, दुर्गानाथ झा श्रीश, उमेश मिश्र, दिनेश कुमार झा, मायानन्द मिश्र ओ बालगोविन्द झा 'व्यथित' आदि जतेक काज इतिहास लेखन पर नीक जका भेल आलोचना संग ततेक निसाफ नहि भेल! रामदेव बाबू आ भीम बाबूक अध्यापकीय आलोचना परंपरा केँ केष्‍कर ठाकुर आ अरूणा चौधरी आगू बढ़ाबै मे सफल भेल छथि। केष्कर ठाकुर अपन पोथी 'सम्बोधित स्वर’ मे से गंभीरतापूर्वक विचार केलनि अछि। योगानंद झा सेहो नीक गवेषक, शोधकर्ता अनुसंधानकर्ता छथि तथापि आलोचक नहि छथि। योगानन्द झाक काज सभ मे गंभीर शोधक  सभटा तत्‍व अनिवार्य रूपेँ उपस्थित रहैत अछि!

             महेन्द्र नारायण राम एकटा बेछप बेराएल लोक छथि। मैथिली फोलोरक विशेषज्ञ - जेना प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’। लोक अस्मिता, संस्कृति आ मिथिला दलित/वंचित समुदायक लोककथा, लोकगाथा आ सांस्कृतिक अध्ययन मे ओ सिद्धदस्त छथि। 'भाओ भगैत गायन' नामक संकलन हो, अथवा हुनक संपूर्ण पोथी ‘लोक संदर्भ’ ओ लोक जीवनक विशुद्ध अध्येता छथि। महेन्द्र नारायण राम लग लोक जीवन आ लोकसंस्‍कृति आदिक अध्ययन नीक छनि मुदा व्यक्त करऽ वला गद्य शोधपरक बेसी छनि, आलोचनात्मक कम! नीक गद्य लिखबा मे ओमप्रकाश भरती सेहो अपन पोथी कोसी अंचलक गीत सबहक संकलन केलनि अछि। लोक संस्कृति सँ विमर्श ठाढ़ करबाक हुनर भारती जी मे खूब छनि। मिथिलाक लोक संस्कृति सबहक नीक सँ अध्येता रहलाह ओमप्रकाश भारती, महेन्द्र नारायण राम मुदा पैराडाइम शिफ्टिंग वाला दृष्टि छनि तारानंद वियोगी लग!
            मैथिलीक समकालीन आलोचना पर कोनो गप्‍प होयत तऽ देवशंकर नवीन पर गप्‍प केने बिना अपूर्ण। ध्‍यान रहए जे देवशंकर नवीन एकटा प्रतिमान सदिखन बनौने अछि! एकटा संरचना निर्धारणक प्रयास  करैत अछि। ‘अक्खर खंभा’ मैथिली कविता संकलन मे अखन धरि जे पोथी सभ आयल अछि ताहि मे सर्वश्रेष्ठ रहल अछि। एनबीटी सँ प्रकाशित ‘अक्खर खम्भा'क भूमिका मैथिली कविता केँ बुझबा मे, सभ काल केर स्थापना मे आ मैथिली कविताक संरचना केँ चिन्हबा मे सर्वाधिक महत्वपूर्ण पोथी अछि। मैथिली साहित्यः दशा दिशा संदर्भ, वर्ष 2011 मे नवारंभ प्रकाशन सँ बहराएल नवीन जीक अल्टीमेट काज अछि। नवीन जी लग आलोचना केँ बुझबाक जेएनयू स्कूल केर सूत्र रहल अछि। नवीन जी केँ प्रो. नामवर सिंह, प्रो. मैनेजर पांडेय, केदारनाथ सिंह सन दिग्गज गुरू लोकनि सँ आलोचनाक परंपरा भेटलनि आ मिथिलाक बुझबाक एकटा सुघर दृष्टि। मुदा अफसोच जे मैथिली केँ जतेक नवीन जी सँ उभेद अछि, से ततेक काज नहि भऽ सकलै। तखनो राजकमल चौधरी सन विराट रचनाकारक सभटा सामग्री प्रकाशित करबाक करेज नवीने जी केँ छनि।

           मैथिली मे आलोचना विधा मे काज भेल अछि। तखन ई अवस्से जे संकलन, संपादन, अनुसंधान आ शोध बेसी भेल अछि आ आलोचना कम! ई सुखद आश्चर्य जे सहित्यक प्राचीनतम् विधा नाटक पर लोक सबहक ध्यान कने गेलनि अछि। महेन्द्र मलंगिया सन मैथिलीक श्रेष्ठ नाटककार आलोचना लिखऽ लगलाह अछि 'शब्दक जंगल मे अर्थक खोज' तकर बेजोड प्रमाण अछि। कमलमोहन चुन्नू जे मैथिली आलोचना मे सभ सँ टटका लोक छथि ओ साहित्यक सभ सँ पुरान विधा नाटक पर शानदार पोथी ‘निनाद’ लिखने छनि! नाट्यालोचन दिस मैथिली केँ बढ़ैत देखब सुखद।

कहल बहुत किछु जा सकैत अछि। तखन एकेटा लेख मे सभटा गप्‍प नहि कहल जा सकैछ! मैथिली आलोचना अखन धरि बाल्यकाल मे अछि। तकर बेसी रास कारण एतऽ थिंकिंग स्कूलक कम्मी अछि! मार्क्स बीसम शताब्दी केँ क्रांतिक शताब्दी कहने छनि। हुनकर परिकल्पना सँ बीसम शताब्दी केँ क्रांतिक सदी भेनाय छल। पूंजीवादक गहरायत अंतर्विरोध पर सर्वहाराक निर्णायक प्रहार भेनाय छल। से बीसम शताब्दी मे जतेक भऽ सकल से भेल। एकैसम शताब्दी मे उनैसम शताब्दीक टूल्स काज नहि करत। आब उत्तर मार्क्सवादी चिंतनक स्कूल केँ सेहो देखऽ पड़त, नव मार्क्सवाद केँ सेहो। मार्क्यूज़ एकठाम लिखैत छथि -
‘‘जखन मार्क्स विकसित औद्योगिक समाज मे समाजवादी रूपांतरणाक गप्‍प केने रहथिन तऽ ओकर मूल मे नहि केवल उत्पादन संबंधक परिपक्वताक गप्‍प छल, ओकर गैर रचनात्मक उपयोगक सेहो गप्‍प छल। पूंजीवादक विरोधक गहींर भेनाय आ ओकरा नष्ट हेबाक आकांक्षा ओकर मूल मे छल। सदीक नव काल मे विकसित औद्योगिक देश मे आंतरिक अंतर्विरोधक बढ़नाय कुशल संतुलन मे बदलि गेल। सर्वहारा क्रांतिकारी चेतना कुंद होमय लागल।''7

                 मैथिली मे आलोचना करबाक काल ध्यान रहए जे की मैथिले आँखि सँ देखब आकि बाहरी चश्मा सँ। एहि मे बाहरी चश्मा मे कनेक संभावना बेसी ई रहत जे तार्किकता प्रबल रहत आ एकभगाह सोच नहि रहत। ध्यान ईहो रहए जे आलोचना आ कीर्तन दुओ भिन्न चीज़ अछि। एकायामी सोच मैथिल आँखि केँ हठपूर्वक प्रस्तुत करबाक आग्रह (दुराग्रह) मैथिली आलोचना केँ बाल्यकाल मे ठाढ़ हमरा लगैत अछि। मैथिली आलोचना केँ बहुआयामी होमय पडैत। मार्क्यूज़ कहैत छथि – ''एकायामी मनुखक भीतर प्रबोधन चेतना नष्ट भऽ जायत अछि। ओ स्वतंत्रता केँ नष्ट करऽ लगैछ! स्वतंत्रताक अर्थ अछि - ज्ञान, इच्छाशक्ति, ई बूझि सकनाय कि हम की चाहैत छी, चूनि सकबाक क्षमता।''8
                    आय जखन संवाद केर स्थिति कमज़ोर होमय लागल अछि, आलोचनात्मक विवेक शून्य होमय लागल अछि, तर्कवादी मानसिकता केँ ध्वस्त कायल जा रहल अछि, एकायामी, एकभगाह एकरंगा फासिस्ट दुनिया बनेबाक सूरसार तेज भऽ रहल अछि, आलोचनाक धार आ आलोचनाक मूल्य एकमात्र आ अंतिम विकल्प रहत कोनो लोकतांत्रिक गणराज्य मे! ठहराव के विरोध करि सकबाक साहस थिक  आलोचना। मैथिली मे वर्त्तमान आलोचक सभ लेल ई चुनौती थिक जे असहमति के साहसि कोना बढाबैत अछि, लोकतांत्रिक विवेक कोना विकसित करत ?  
           




संदर्भ सूची

1.       मोहन भारद्वाज सँ आशुतोष कुमार झाक भेंटवार्ता मैथिली साहित्यक आलोचना मिथिलाकेँ पढ़िकऽ कयल जयबाक चाही, सन्धान 4, पृ. 56-57

2.      मिशेल फूको - Essential works – Vol. 3. P – 284

3.      Jurgen Habermas. The Philosophical discourse of Modernity, Policy, Press – 1998.

4.      राजकमल चौधरी, कविता राजकमलक पृ. - 148, सं. मोहन भारद्वाज, मैथिली अकादमी पटना, सं. - 1981

5.     कुलानन्द मिश्र - बदलैत सौन्दर्यबोध आ कविता, पृ. - 3 मैथिली अकादमी पटना, सं. - 2014

6.     इन्दुधर झा - आचार्य रमानाथ झा ओ मैथिली आलोचना, पृ. – 114

7,8.     Marrcuse Herbert, Reason and Revolution Hegal and the Rise of Social Theory, Rouledge and Kegan Paul, London and Henley Reprint, 1986, P – 436.  अच्युतानंद मिश्र, बाज़ार के अरण्य में' आधार प्रकाशन,पंचकूला हरियाणा