तेँ किछु आर (समीक्षा)
-- उदयचंद्र झा 'विनोद'
विपुल उनका ऋण , सधा सकता न मैं दशमांश, जनकवि नागार्जुनक ई पाँती आइ बडी जोर सँ मोन पडि आयल जाहि काल नवाररम्भ सँ सदयःप्रकाशित कविताक 128पृष्ठीय एक गोट किताब पढैत रही, कवि छथि मैथिली आ हिन्दी मे समान गति सँ कविता लिखैत सहरसा जिलाक चैनपुर गामक निवासी आब प्रवासी चौंतीस वर्षीय युवा अरुणाभ सौरभ आ पोथीक नाम थिक तेँ किछु आर। एहि किताब मे यत्र तत्र सर्वत्र से ऋण सधयबाक उपक्रम करैत हिनका सुविधापूर्वक देखल जा सकैत अछि। एतबे टा नहि, एहि नामक हिनक पहिल संग्रह पढल अछि, हिन्दीक दीर्घ कविता प्रसंग लम्बी कविता का वितान नामक एक सुन्दर विवेचनात्मक किताब हालहि मे पढि तृप्त भेल छी।मैथिली मे साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार आ हिन्दी मे भारतीय ग्यानपीठ युवा सम्मान सँ स्वीकृत एहि प्रतिभाक वितान हमरा सतत आनन्दित करैत रहल अछि। निस्संदेह नागार्जुन आ राजकमल चौधरीक बाद अरुणाभक माध्यमे हिन्दी कविता मे कोनो मैथिलक ई प्रबल हस्तक्षेप थिक।
हिनका कविता मे एक आम भारतीय नागरिक रूप मे एक मैथिल अपन उज्ज्वल अतीतक परिप्रेक्ष्य मे सीदित वर्त्तमान बजैत अछि। एकरंगा दुनिया बनयबाक सूरसार विरूद्ध हिनक कविता धारदार हथियार जकाँ अडैत अछि। हिनका स्मृतिक पेटार मे आलिंगनक चंगेरा मे चुम्बनक अहिवात पुरहर संग बिताओल सुखक अंतरंगता सैंतल अछि।हिनका अपना गामक संग मोन पडैत छनि
फूल बाबूक, भारती मंडनक गाम महिषी। बनगाम मोन छनि। मायानन्द मिश्रक जेना ई चर्च करैत छथि, कोशी मे विलुप्त होइत माया बाबूक बनैनियाँ संग अनेक गामक जेना ई उदाहरण दैत छथि, अपराध गाथा मे ओझरायल सहरसाक जेना खोज करैत छथि से ठीके विशेष। स्वतः प्रमाणम हिनका मोन छनि , कटगर खटगर स्नेहिल मातृभाषा हिनका अपना दिस घीचैत छनि। विविधताक पक्ष मे सामर्थ्य सँ लडैत कवि के विश्वास छैक जे अन्ततः लोकल जितबे करतै, चाउर देखबाक लिलसा लागल नहि रहतै। बँसबिट्टीक कोइलीक स्वर एखनो अकानैत छथि, छोट छीन दोकान दौरीक महत्व मानै छथि, फँसरी लगा नहि मरतै आब गरिबहा से तानैत छथि। केहन दिब कहैत छथि से कनिएँ देखल जायः
हम कहब माटि ओ कहताह इस्पात
हम कहब खेत ओ कहता लैब
हम कहब खेती ओ कहता डिजिटल
हम कहब गाछ ओ कहता मौल
हम कहब पानि अओ कहता वाइन
हम कहब भूख ओ कहता विकास
हम कहब रोटी ओ कहता पिज्जा।
नियोजित विचार सँ पूर अपन एहि विलक्षण सर्जकक हम स्वागत करैत छी संगहि आशा करैत छी जे निरन्तर नव क्षितिजक संधान करैत आगाँ बढताह, भाषा भूमिक विरूद्ध चलैत दुरभिसन्धिक उकन्नन करताह। जय मैथिली।
फूल बाबूक, भारती मंडनक गाम महिषी। बनगाम मोन छनि। मायानन्द मिश्रक जेना ई चर्च करैत छथि, कोशी मे विलुप्त होइत माया बाबूक बनैनियाँ संग अनेक गामक जेना ई उदाहरण दैत छथि, अपराध गाथा मे ओझरायल सहरसाक जेना खोज करैत छथि से ठीके विशेष। स्वतः प्रमाणम हिनका मोन छनि , कटगर खटगर स्नेहिल मातृभाषा हिनका अपना दिस घीचैत छनि। विविधताक पक्ष मे सामर्थ्य सँ लडैत कवि के विश्वास छैक जे अन्ततः लोकल जितबे करतै, चाउर देखबाक लिलसा लागल नहि रहतै। बँसबिट्टीक कोइलीक स्वर एखनो अकानैत छथि, छोट छीन दोकान दौरीक महत्व मानै छथि, फँसरी लगा नहि मरतै आब गरिबहा से तानैत छथि। केहन दिब कहैत छथि से कनिएँ देखल जायः
हम कहब माटि ओ कहताह इस्पात
हम कहब खेत ओ कहता लैब
हम कहब खेती ओ कहता डिजिटल
हम कहब गाछ ओ कहता मौल
हम कहब पानि अओ कहता वाइन
हम कहब भूख ओ कहता विकास
हम कहब रोटी ओ कहता पिज्जा।
नियोजित विचार सँ पूर अपन एहि विलक्षण सर्जकक हम स्वागत करैत छी संगहि आशा करैत छी जे निरन्तर नव क्षितिजक संधान करैत आगाँ बढताह, भाषा भूमिक विरूद्ध चलैत दुरभिसन्धिक उकन्नन करताह। जय मैथिली।
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